गन्ना

सामान्य जानकारीATION

गन्ना, सैचेरम ऑफिसिनैरम एल. एक सदाबहार फसल है और बांस के परिवार से संबंधित है। यह भारत की स्थानीय फसल है यह चीनी, गुड़ और खाण्डसारी का मुख्य स्त्रोत है। गन्ने की फसल का दो तिहाई हिस्सा गुड़ और खाण्डसारी बनाने में और एक तिहाई हिस्सा चीनी की फैक्टरियों में जाता है। यह शराब बनाने के लिए कच्चा माल प्रदान करता है। गन्ना सबसे ज्यादा ब्राजील और बाद में भारत, चीन, थाईलैंड, पाक्स्तिान और मैक्सीको में उगाया जाता है। शक्कर बनाने के लिए भारत में सबसे ज्यादा हिस्सा महाराष्ट्र का जो कि 34 प्रतिशत है और दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश आता है।

उत्तर प्रदेश में 135 मिलियन टन गन्ने के उत्पादन के साथ लगभग 22.77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती की जाती है। सहारनपुर, शाहजहांपुर,फैज़ाबाद,जौनपुर, बुलंदशहर, आज़मगढ़, बल्लिया, वाराणसी, शामली, मुज्जफरनगर, मेरठ, हापुर उत्तर प्रदेश के मुख्य गन्ना उत्पादक जिले हैं।

जलवायु

सामान्य तापमान

20-30°C

वर्षा

75 - 100CM

बुवाई के समय तापमान

20-25°C

कटाई के समय तापमान

20-30°C

मिट्टी

अच्छे जल निकास वाली गहरी, दोमट मिट्टी, जिसमें भूजल का स्तर ज़मीन से 1.5-2 मी. के नीचे हो और अच्छी जल धारण क्षमता वाली वाली ज़मीन गन्ने की खेती के लिए लाभदायक है। यह फसल काफी अम्लीय और खारेपन को सहन कर सकती है। इसलिए इसे मिट्टी जिसकी पी एच 5 से 8.5 हो, में उगाई जा सकती है। यदि मिट्टी का पी एच 5 से कम हो तो इसमें चूना (कली) डालें और यदि मिट्टी का पी एच 9.5 से ज्यादा हो तो इसमें जिप्सम डालें।

ज़मीन की तैयारी

खेत की दो बार जोताई करें। पहली जोताई 20-25 सैं.मी. होनी चाहिए। कंकड़ों को मशीनी ढंग से अच्छी तरह तोड़कर समतल कर दें।

खालियां और मेंड़ बनाकर सूखी बिजाई:- ट्रैक्टर वाली मेंड़ बनाने वाली मशीन की मदद से मेंड़ और खालियां बनाएं और इन मेड़ और खालियों में बिजाई करें। मेड़ में 90 सैं.मी. का फासला होना चाहिए। गन्ने की गुलियों को मिट्टी में दबाएं और हल्की सिंचाई करें।

पंक्तियों के जोड़े बनाकर बिजाई:- खेत में 150 सैं.मी. के फासले पर खालियां बनाएं और उनमें 30-60-90 सैं.मी. के फासले पर बिजाई करें। इस तरीके से मेड़ वाली बिजाई से अधिक पैदावार मिलती है।

गड्ढा खोदकर बिजाई: - गड्ढे खोदने वाली मशीन से 60 सैं.मी. व्यास के 30 सैं.मी. गहरे गड्ढे खोदें जिनमें 60 सैं.मी. का फासला हो। इससे गन्ना 2-3 बार उगाया जा सकता है और आम बिजाई से 20-25 प्रतिशत अधिक पैदावार आती है।

एक आंख वाले गन्नों की बिजाई :– सेहतमंद गुलियां चुनें और 75-90 सैं.मी. के अंतर पर खालियों में बिजाई करें। गुलियां एक आंख वाली होनी चाहिए। यदि गन्ने के ऊपरले भाग में छोटी डलियां चुनी गई हों तो बिजाई 6-9 सैं.मी. के अंतर पर करें। फसल के अच्छे उगने के लिए आंखों को ऊपर की ओर रखें और हल्की सिंचाई करें।

अगेती पकने वाली किस्में: CoS 687, CoS 8436, CoS 88230, CoS 95435, CoS 91232

मध्य मौसम और देरी से पकने वाली किस्में: Co 1148, CoS 767, BO 91

पूर्वी यू पी के बाढ़ संभावित क्षेत्रों के लिए किस्में: CoSe 96234, CoSe 96436, Co-98014 (Karan-1), Co-pant 97222, Colk-94184(Birendra), Co-0233 (Kamal), Co-0233

Co 87263: इसे सरायु के नाम से भी जाना जाता है। इसकी बिजाई के लिए फरवरी से मार्च का समय उपयुक्त होता है। इसकी औसतन पैदावार 264 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म कांगियारी और रतुआ रोग के प्रतिरोधक किस्म है।

Co 87268 (Moti): इस किस्म की बिजाई के लिए फरवरी से मार्च का महीना उपयुक्त होता है। इसकी औसतन पैदावार 312 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म कांगियारी और रतुआ रोग के प्रतिरोधक किस्म है।

Co Pant 90223: इस किस्म की बिजाई के लिए फरवरी से मार्च का महीना उपयुक्त होता है। इसकी औसतन पैदावार 292 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म कुछ हद तक रतुआ रोग और कांगियारी के प्रतिरोधी और सुखा और जलजमाव को सहनेयोग्य है।

CoS 1230: इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

BO 128 (Pramod): यह किस्म बसंत में बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 276 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह जल जमाव को सहनेयोग्य किस्म है।

Co 89029: इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoSe 92423: यह किस्म बसंत में बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह रतुआ रोग के प्रतिरोधक किस्म है।

CoSe 95422 (Rasbhari): यह किस्म बसंत में बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 271 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह रतुआ रोग के प्रतिरोधक किस्म है।

CoS 94270 (Sweta): यह किस्म कुछ हद तक रतुआ रोग के प्रतिरोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 324 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoLK 94184 (Birendra): यह जल्दी पकने वाली किस्म है। यह मोढ़ी फसल के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 320 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

दूसरे राज्यों की किस्में

Cos 1230:
इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoH 2201: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 300 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Cos 95255: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 295 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoS 94270: इसकी औसतन पैदावार 345 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoH 119: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 345 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Co 9814: यह जल्दी पकने वाली किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 320 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Co 1148: यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसका अंकुरण अच्छा होता है, शाखाएं बहुत ज्यादा निकलती हैं इसकी मोढ़ी फसल की क्षमता बहुत अच्छी होती है। इससे मध्यम गुणवत्ता के गुड़ का उत्पादन होता है। यह रतुआ रोग के प्रति अधिक संवेदनशील है। इसकी औसतन पैदावार 375 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

COS 767: यह किस्म दिसंबर महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म सूखे के साथ साथ जल जमाव की स्थिति में भी खड़ी रह सकती है। इसकी औसतन पैदावार 300 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। इसमें टी एस एस की मात्रा 16-18 प्रतिशत होती है।

COH 99: यह मध्यम समय की किस्म है। इसमें टी एस एस की मात्रा 17.5 प्रतिशत होती है। यह किस्म सूखे की स्थितियों में खड़ी रह सकती है। इस किस्म की पूरे हरियाणा के लिए सिफारिश की गई है। इसकी औसतन पैदावार 280 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CO 7717: यह मध्य समय की किस्म है। इसमें टी एस एस की मात्रा 17 प्रतिशत होती है। यह किस्म गर्दन तोड़ के प्रतिरोधक है। इससे प्राप्त रस अच्छी किस्म का होता है और इसे लंबे समय के लिए संभाला जा सकता है। इसकी औसतन पैदावार 350 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

CoS 8436: यह मध्य मौसम की किस्म है और थोड़ी लाल रंग की है जिसके गन्ने ठोस, मोटे और हरे रंग के होते हैं। यह किस्म रतुआ रोग को सहने योग्य और ना गिरने वाली किस्म है। उपजाऊ भूमि में इसकी पैदावार अधिक प्राप्त की जा सकती है। इस किस्म की पैदावार 307 क्विंटल प्रति एकड़ है।

COJ64: यह अगेती पकने वाली किस्म है इसका अच्छा जमाव होता है। यह किस्म मोढ़ी की फसल के लिए अच्छी है इसका गुड़ अच्छा बनता है परंतु यह किस्म रतुआ रोग को सहन नहीं कर सकती। इसकी औसत पैदावार 300 क्विंटल प्रति एकड़ है।

COH 56: यह अगेती मौसम की और अधिक उपज वाली किस्म है। यह किस्म गर्दन तोड़ और रतुआ रोग के प्रतिरोधक है। इसकी औसतन पैदावार 300 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

COH 92: यह अगेते मौसम की किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 250 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

बीज की मात्रा
अलग-अलग तजुर्बों से यह सिद्ध हुआ है कि 3 आंख वाली गुलियों का जमाव अधिक होता है जब कि एक आंख वाली गुली अच्छी नहीं जमती क्योंकि दोनों ओर काटने के कारण गुली में पानी की कमी हो जाती है और ज्यादा आंखों वाली गुलियां बीजने से भी अधिक जमाव नहीं मिलता।
दो आंख वाली गुलियां 35000 और तीन आंख वाली गुलियां 23000 प्रति एकड़ में प्रयोग करें। दूसरे शब्दों में 35-40 क्विंटल बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।
 
बीज का उपचार

बीज 6-7 महीनों की फसल पर लगाएं जो कि कीड़ों और बीमारियों से रहित हो। बिमारी और कीड़े वाले गन्ने और आंखों को ना चुनें। बीज वाली फसल से बिजाई से एक दिन पहले काटें इससे फसल अच्छा जमाव देती है। गुलियों को कार्बेनडाज़िम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में भिगो दें। रसायनों के बाद गुलियों को एज़ोस्पिरिलम के साथ उपचार करें। इससे गुलियों को एज़ोस्पिरिलम 800 ग्राम प्रति एकड़ पानी में बिजाई से पहले 15 मिनट के लिए रखें।  
 
Soil Treatment: 
मिट्टी के उपचार के लिए जीवाणु खाद और रूड़ी का प्रयोग करना चाहिए। इसलिए 5 किलो जीवाणु खाद को 10 लीटर पानी में घोलकर मिश्रण तैयार कर लें। इस मिश्रित घोल को 80-100 किलो रूड़ी में मिलाके घोल तैयार कर लें। इस घोल को मेंड़ पर बीजे गन्ने की गुलियों पर छिड़कें। इसके बाद मेंड़ को मिट्टी से ढक दें।

बुआई का समय
यू पी में गन्ने की खेती का उपयुक्त समय बसंत का मौसम है। फरवरी से मार्च गन्ने की रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त समय है।
 
फासला
उपउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कतारों में 60-120 सैं.मी. का फासला रखें।
 
रोपाई का तरीका

बिजाई के लिए सुधरे ढंग जैसे कि गहरी खालियां, मेंड़ बनाकर,पंक्तियों में जोड़े बनाकर और गड्ढा खोदकर बिजाई की जाती है।

खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

UREASSPMOP
130-200125

आर्गेनिक खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

BIO DAPNPKMix Fertilizer
130-200125100-200

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGENPHOSPHORUSPOTASH
60-9020
 
 

खादों की सही आवश्यकता जानने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष के बाद मिट्टी की जांच जरूरी है। बिजाई से पहले आखिरी जोताई के समय अच्छी तरह सेसड़ी हुई गोबर की खाद व कम्पोस्ट 8 टन या वर्मीकंपोस्ट + रालीगोल्ड 8-10 किलो या पी एस बी 5-10 किलो प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन 60-90 किलो (यूरिया 135-200 किलो) और फासफोरस 20 किलो (एस एस पी 125 किलो) प्रति एकड़ में डालें। फासफोरस की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को दूसरी और चौथी सिंचाई के समय डालें। सर्दियों के मौसम में तापमान कम होने के कारण फसल तत्व ज्यादा लेती है जिस कारण मौधा पीला पड़ जाता है इसकी रोकथाम के लिए N:P:K 19:19:19 की स्प्रे 100 ग्राम 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के लिए प्रयोग करें। जिन इलाकों में पानी की कमी है वहां यूरिया+पोटाश का प्रयोग 2.5 किलोग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर करें।

गन्ने में नदीनों के कारण 12-72 प्रतिशत पैदावार का नुकसान होता है। शुरूआती 60-120 दिनों तक नदीनों की रोकथाम बहुत जरूरी है। इसलिए रोपाई के बाद 3-4 महीने की फसल में नदीनों की रोकथाम करें। नीचे लिखे तरीकों से नदीनों को रोका जा सकता है।

1) हाथों से गोडाई करके : गन्ना एक व्यापक जगह लेने वाली फसल है। इसलिए नदीनों को गोडाई करके रोका जा सकता है इसके इलावा प्रत्येक सिंचाई के बाद 3-4 गोडाई जरूरी है।

2) काश्तकारी ढंग : इस प्रक्रिया में खेती के तरीके, अंतरफसली और मलचिंग तरीके शामिल हैं। बहुफसली के कारण नदीनों का हमला ज्यादा होता है। इसकी रोकथाम के लिए चारे वाली फसलें और हरी खाद वाली फसलों के आधार वाला फसली चक्र गन्ने में नदीनों की रोकथाम करता है। गन्ना एक व्यापक जगह लेने वाली भी फसल है। जिससे नदीनों के हमले का खतरा भी ज्यादा होता है। यदि गन्ने को कम समय वाली फसलों के साथ अंतरफसली किया जाए तो इससे नदीनों को कम किया जा सकता है और ज्यादा लाभ भी मिल सकता है। गन्ने के अंकुरन के बाद गन्ने की कतारों में 10-12 सैं.मी. मोटी तह बिछा दी जाती है। यह सूर्य की रोशनी को सोखता है। जिससे नदीन कम होते हैं। यह मिट्टी में नमी को भी बचाता है।

रासायनिक तरीके : नदीनों को रोकने के लिए नदीनों के अंकुरण से पहले सिमाज़िन या एट्राज़िन 0.6-0.8 किलो या मैट्रीब्यूज़िन 0.4 किलो या ड्यूरॉन 1-1.2 किलो प्रति एकड़ में डालें। इन नदीननाशकों को बिजाई के तुरंत बाद डालें। 2,4-D 0.3-0.4 किलो नदीनों के अंकुरण के बाद गन्ने में चौड़े पत्ते वाले नदीनों को रोकने के लिए डालें।

 

सिंचाई की संख्या मिट्टी की किस्म, पानी की उपलब्धता आदि पर निर्भर करती है। गर्म मौसम में शुष्क हवा और सूखा फसल में पानी की आवश्यकता को बढ़ा देता है।

फसल के 20-25 प्रतिशत अंकुरण होने पर पहली सिंचाई करें। मॉनसून में बारिश की तीव्रता और नियमितता के आधार पर सिंचाई करें। कम बारिश होने पर 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। उसके बाद सिंचाई की संख्या बढ़ा दें। दूसरे शब्दों में 20-25 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। मिट्टी में नमी को बनाए रखने के लिए गन्ने की कतारों के बीच मलचिंग करें। अप्रैल से जून में पानी की कमी ना होने दें। इन दिनों में पानी की कमी उपज को कम करती है। खेत में पानी ना खड़ा होने दें। शाखाएं निकलने और विकास होने की अवस्थाएं सिंचाई के लिए गंभीर होती हैं।

मिट्टी को मेंड़ पर चढ़ाना : कही का प्रयोग करके गन्ने की मेंड़ चढ़ानी जरूरी है क्योंकि यह कमाद को गिरने से बचाती है और खादों को भी मिट्टी में मिलाने में सहायता करती है।

पौधे की देखभाल
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अगेती फोट का छेदक :

अगेती फोट का छेदक :यह सुंडी फसल के उगने के समय हमला करती है। यह सूण्डी जमीन के नजदीक तने में सुराख करती है और पौधे को सुखा देती है। जिससे गंदी बास मारती है। यह कीड़ा आम तौर पर हल्की जमीनें आर शुष्क वातावरण में मार्च से जून के महीनों में हमला करती है। इसकी रोकथाम के लिए फसल अगेती बीजनी चाहिए।

फसल बीजने के समय क्लोरोपाइरीफॉस 1 लीटर को 100-150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ गुलियों पर स्प्रे करें । यदि बिजाई के समय इस दवाई का प्रयोग ना किया जाये तो इसका प्रयोग खड़ी फसल में भी कर सकते हैं। सूखे हुए पौधों को नष्ट करें । हल्की सिंचाई करें और खेत को शुष्क होने से रोकें। 

सफेद सुंडी: 

सफेद सुंडी : यह सुण्डी जड़ों पर हमला करती है। जिस कारण गन्ना खोखला हो जाता है और गिर जाता है। शुरू में इसका नुकसान कम होता है परंतु बाद में सारे खेत में आ जाता है।
 
ये सुण्डियां बारिश पड़ने के बाद मिट्टी में से निकल कर नजदीक के वृक्षों में इक्ट्ठी हो जाती हैं और रात को इसके पत्ते खाती हैं। यह मिट्टी में अंडे देती हैं जो कि छोटी जड़ों को खाती हैं। गन्ने की जड़ों में इमीडाकलोपरिड 4-6 मि.ली. को प्रति 10 लीटर पानी में मिला कर प्रयोग करें।
 
फसल अगेती बीजने से भी इसके नुकसान से बचा जा सकता है। बीजों का कलोरपाइरीफॉस से उपचार करना चाहिए । इसके इलावा 4 किलो फोरेट या कार्बोफिउरॉन 13 किलो प्रति एकड़ को मिट्टी में मिलाएं । खेत में पानी खड़ा करके भी इस कीड़े को रोका जा सकता है। क्लोथाइनीडिन 40 ग्राम एकड़ को 400 लीटर पानी में मिलाकर डालें।

 

दीमक : 

दीमक : बुआई से पहले बीजों का उपचार करें। गुलियों को इमीडाक्लोप्रिड के घोल 4 मि.ली. को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर 2 मिनट के लिए डुबोयें या बुआई के समय क्लोरपाइरीफॉस 2 लीटर प्रति एकड़ की स्प्रे बीजों पर करें। यदि खड़ी फसल पर इसका हमला दिखे तो जड़ों के नज़दीक इमीडाक्लोप्रिड 60 मि.ली. को प्रति 150 लीटर पानी या क्लोरपाइरीफॉस 1 लीटर को प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर डालें।

पायरिल्ला :

पायरिल्ला : इसका ज्यादा हमला उत्तरी भारत में पाया जाता है। बड़े कीड़े पत्ते के निचली तरफ से रस चूसते हैं। इससे पत्तों पर पीले सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और पत्ते नष्ट हो जाते हैं। ये पत्तों पर शहद जैसा पदार्थ छोड़ते हैं। जिससे फंगस पैदा हो जाती है और पत्ते काले रंग के हो जाते हैं।
 
नियमित फासले पर सफेद फूले हुए अंडों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। गंभीर हमला होने पर डाइमैथोएट या एसीफेट 1-1.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 

जड़ छेदक :

जड़ छेदक : यह कीड़ा धरती में होता है। जो गन्ने के अंदर जाकर पत्ते पीले कर देता है। इसका नुकसान जुलाई महीने से शुरू होता है। इसके हमले से पत्ते पीले शिखर से नीचे तक पीले पड़ने शुरू हो जाते हैं और धारियां भी पड़ जाती हैं।
 
फसल बीजने से पहले गुलियों का क्लोरपाइरीफॉस से उपचार करें। शुष्क खेतों में इसका नुकसान कम होता है। इसलिए खेत में पानी ना खड़ा होने दें। फसल बीजने से 90 दिनों के बाद मेंड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं । ज्यादा नुकसान के समय क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. 1 लीटर प्रति एकड़ को 100-150 लीटर पानी में मिलाकर गन्ने की जड़ों में डालें। क्विनलफॉस 300 मि.ली प्रति एकड़ भी इसकी रोकथाम करता है। प्रभावित पौधे को खेत में से उखाड़ देना चाहिए।

शाख का छेदक : 

शाख का छेदक : यह कीड़ा जुलाई में हमला करता है और मानसून के हिसाब से इसका नुकसान बढ़ता जाता है। यह कीड़ा गन्ने के कईं भागों पर हमला करता है परंतु यह पत्तों के अंदर की तरफ और जड़ में रहता है। इसका नुकसान गन्ने बांधने से लेकर कटाई तक होता है। 
 
नाइट्रोजन का अत्याधिक प्रयोग ना करें। खेत को साफ सुथरा रखें। पानी के निकास का उचित प्रबंध करें। गर्दन तोड़ से फसल को बचाने के लिए मेंड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं। रासायनिक नियंत्रण बहुत कम प्रभावशाली है। मित्र कीट कुटेशिया फ्लेवाइपस की 800 मादा प्रति एकड़ एक सप्ताह के फासले पर जुलाई से नवंबर तक प्रति एकड़ में छोड़ें।

मुरझाना :

मुरझाना : जड़ बेधक, नेमाटोडस, शुष्क और ज्यादा पानी खड़ने के हालातों में यह बीमारी ज्यादा आती है। इससे पत्ते पीले पड़ कर सूख जाते हैं। पौधों में किश्ती के आकार के गड्ढे पड़ जाते हैं और फसल सिकुड़ जाती है। इससे फसल का उगना और पैदावार दोनों ही कम हो जाती है।
 
इसकी रोकथाम के लिए गुलियों को कार्बेनडाज़िम 0.2 प्रतिशत+बोरिक एसिड 0.2 प्रतिशत के घोल में 10 मिनट तक उपचार करें। इसके इलावा प्याज लहसुन और धनिये की फसल भी इस बीमारी को कम करने में मदद करती है।

चोटी गलन : 

चोटी गलन : यह बीमारी हवा से पैदा होती है जो मॉनसून में होती है। बीमारी वाले गन्ने के पत्ते सिकुड़ जाते हैं। तने के नजदीक वाले पत्ते लाल हो जाते हैं। नए पत्ते छोटे और तिरछे हो जाते हैं।
 
इस बीमारी की प्रतिरोधक किस्मों का प्रयोग करें। यदि इसका हमला दिखे तो कार्बेनडाज़िम 4 ग्राम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या मैनकोज़ेब 3 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई

ज्यादा पैदावार और चीनी प्राप्त करने के लिए गन्ने की सही समय पर कटाई जरूरी है। समय से पहले या बाद में कटाई करने से पैदावार पर प्रभाव पड़ता है। किसान शूगर रीफरैक्टोमीटर का प्रयोग करके कटाई का समय पता लगा सकते हैं। गन्ने की कटाई द्राती की सहायता से की जाती है।गन्ना धरती से ऊपर थोड़ा हिस्सा छोड़कर काटा जाता है क्योंकि गन्ने में चीनी की मात्रा ज्यादा होती है। कटाई के बाद गन्ना फैक्टरी में लेकर जाना जरूरी होता है।

कटाई के बाद

गन्ने को रस निकालने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके इलावा गन्ने के रस से चीनी, गुड़ और शीरा प्राप्त किया जाता है।

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