पपीता

सामान्य जानकारीATION

यह एक प्रसिद्ध फल है जिसका मूल स्थान मैक्सिको है। यह पौष्टिक भी है और इसकी औषधीय विशेषताएं भी हैं। पपीता विटामिन ए और सी का उच्च स्त्रोत है। यह त्वचा के लिए उत्तम है। इसके एंटीऑक्सीडेंट्स समय से पहले उम्र बढ़ने को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। यह रक्त कोलेस्ट्रोल को कम करने में भी उपयोगी है। फल के साथ साथ इसकी पत्तियों का प्रयोग भी हर्बल उत्पाद बनाने के लिए किया जाता है। पत्तियों का प्रयोग डेंगू के उपचार के लिए किया जाता है। भारत पपीता का प्रमुख उत्पादक देश है। भारत में उत्तर प्रदेश, आंध्रा प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा, गुजरात, आसाम, पश्चिम बंगाल, केरला, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश मुख्य पपीता उगाने वाले राज्य हैं।

जलवायु

सामान्य तापमान

14-40°C

वर्षा

300 - 400MM

बुवाई के समय तापमान

15-20°C
30-37°C

कटाई के समय तापमान

30-40°C
15-20°C

मिट्टी

इसे मिट्टी की व्यापक किस्मों में उगाया जा सकता है। अच्छे निकास वाली पहाड़ी मिट्टी पपीते की खेती के लिए उपयुक्त होती है। रेतली और भारी मिट्टी में इसकी खेती ना करें। पपीते की खेती के लिए मिट्टी की पी एच 6.5-7.0 होनी चाहिए।

ज़मीन की तैयारी

पपीते की खेती के लिए नदीन रहित भूमि का प्रयोग करें। मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई करें। आखिरी जोताई के समय अच्छी तरह से गली हुई रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर डालें। सिफारिश किए गए फासलों पर 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर आकार के गड्ढे खोदें। गड्ढों को मिट्टी और रूड़ी की खाद या गाय के गले हुए गोबर से भरें। प्रयोग की गई किस्म के आधार पर प्रत्येक गड्ढे पर 2-4 नए पौधों की रोपाई करें। रोपाई के बाद हल्की सिंचाई करें। हवा से बचाव के लिए खूंटा लगाएं।

Pusa Dwarf: इसके फल मध्यम आकार के और अंडाकार होते हैं। यह सूखे को सहनेयोग्य किस्म है। यह उच्च घनत्व में रोपाई के लिए लाभदायक है।

Pusa Giant: इस किस्म के पौधे तेज हवा को सहनेयोग्य है। यह बड़े फलों का उत्पादन करती है। यह पैकिंग के लिए उपयुक्त किस्म है।

CO 3: इसके फल बड़े आकार के और अंडाकार होते हैं। इसे ज्यादा देर तक रखने की गुणवत्ता अच्छी होती है।

CO 1: यह छोटे कद की किस्म है जिसके फल मध्यम आकार के होते हैं। फल गोलाकार, नर्म हरा-पीला छिल्का और संतरी पीले रंग का गुद्दा होता है। फल रसदार होता है और इसे ज्यादा देर तक रखने की गुणवत्ता अच्छी होती है।

Coorg Honey Dew: इसे सीधे तौर पर खाने के लिए और प्रक्रिया के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके फल आयताकार और गुद्दा मोटा संतरी रंग का होता है।

CO 2: यह मध्यम आकार की अंडाकार, हरे पीले रंग की किस्म है। इसका गुद्दा नर्म और लाल रंग का होता है। इसमें रस की मात्रा काफी होती है और इसे ज्यादा देर तक रखने की गुणवत्ता अच्छी होती है।

Pusa Majesty: इसके फल मध्यम आकार के, गोल होते हैं इन्हें रखने की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है। यह किस्म 146 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म जड़ गलन निमाटोड के प्रतिरोधक किस्म है।

Pusa Delicious: यह मध्यम लंबी किस्म है। इसके फल मध्यम आकार के होते हैं, गुद्दा गहरे संतरी रंग का होता है। इस किस्म को कतारों में लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

CO 5: यह किस्म दो वर्षों में 75-80 फल प्रति वृक्ष देती है।

IIHR39 and IIHR54: यह किस्म IIHR, बैंगलोर द्वारा विकसित की गई है। इसके फल मध्यम आकार के होते हैं इसमें टी एस एस की मात्रा उच्च होती है।

Taiwan 785: यह छोटे कद की किस्म है। इसके फल आयताकारा और गुद्दा मोटा संतरी रंग का होता है। फलों को रखने की गुणवत्ता अच्छी होती है। फलों को कतारों में प्रयोग किया जाता है और प्रक्रिया के लिए प्रयोग किया जाता है।

Taiwan 786: इसके फलों को कतारों में और प्रक्रिया के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके फल स्वाद और कम बीज वाले होते हैं। फलों को रखने की गुणवत्ता बहुत अच्छी होती है।

Washington: यह कतारों में प्रयोग किए जाने वाली किस्म है। इसके फल गोल, मध्यम आकार के और कम बीज वाले होते हैं। फल का छिल्का गहरे पीले रंग का होता है। नर और मादा पौधे अलग होते हैं।

Solo: इसके फल छोट, गहरे गुलाबी रंग का गुद्दा होता है, जो कि स्वाद में मीठा होता है। यह किस्म कतारों में प्रयोग की जाती है।

Ranchi: फल आयताकार होते हैं और गुद्दा गहरे पीले रंग का होता है।

Honey Dew: इस किस्म के फल बड़े आकार के और कम बीज वाले होते हैं। फल स्वाद होते हैं और नर पौधे मादा पौधे से छोटे होते हैं। इसका पौधा मध्यम कद का होता है।

बीज की मात्रा
100-120 ग्राम बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बीज का उपचार
अच्छे अंकुरण के लिए थायोयूरिया 100-200 पी पी एम और जिबरेलिक एसिड 200 पी पी एम से बीजों का उपचार करें। पौधे को मिट्टी से होने वाली बीमारियों से बचाने के लिए, बिजाई से पहले थीरम 3 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

बीजों को 150 गेज़ की मोटाई वाले, 25 x 10 सैं.मी. के पॉलीथीन बैग में बोयें। पानी के उचित निकास के लिए पॉलीथीन बैग के निचले हिस्से में 1 मि.मी. अर्द्धव्यास का छेद करें। उसके बाद पॉलीथीन बैग में समान अनुपात में रूड़ी की खाद, मिट्टी और रेत डालें। बिजाई से पहले बीजों का उपचार करें। रोपाई के लिए 6-7 सप्ताह के पौधों का प्रयोग करें।

बुआई का समय
बसंत के मौसम में फरवरी मार्च के महीने में बिजाई करें जबकि मॉनसून के मौसम में बिजाई के लिए जून जुलाई का महीना उपयुक्त होता है और पतझड़ के मौसम में बिजाई अक्तूबर से नवंबर महीने में की जाती है।

फासला
आमतौर पर 1.8 मीटर x 1.8 मीटर फासले का प्रयोग किया जाता है। उच्च घनता की रोपाई के लिए 1.5 मीटर x 1.5 मीटर फासले का प्रयोग किया जाता है।
 
गहराई
नर्सरी में बीज को 1 सैं.मी. की गहराई पर बोयें।

रोपाई का तरीका
बीजो की खेत में सीधे बिजाई या मुख्य खेत में नए पौधों की रोपाई की जाती है।
 

Fertilizer Requirement (gm/tree/year)

UREAPHOSPHORUSPOTASH
15080100

Organic Fertilizer Requirement (gm/tree/year)

BIO-DAPNPKMIX FERTILIZER
15080100

यूरिया 150 ग्राम, फासफोरस 80 ग्राम, पोटाश 100 ग्राम प्रति वृक्ष में प्रति वर्ष डालें। खादों को 4 भागों में बांटकर रोपाई के बाद पहले, तीसरे, पांचवे और सातवें महीने में डालें।

पौधे की प्रौढ़ अवस्था के दौरान खरपतवारो की रोकथाम जरूरी होती है। नदीनों की तीव्रता के आधार पर, नियमित और हल्की गोडाई करें। फ्लूक्लोरालिन या बूटाक्लोर 800 मि.ली. प्रति एकड़ में डालें। खरपतवारो की रोकथाम के लिए मलचिंग भी एक प्रभावी तरीका है। पौधों की रोपाई के कुछ दिनों बाद प्लास्टिक शीट या धान की पराली या गन्ने के बचे कुचे को मलच के रूप में डालें।

मादा पौधे को निकालना: प्रत्येक 10 पौधों के लिए 1 नर पौधा, बनाए रखने के लिए फूल निकलने के बाद नर पौधों को निकाल दें।

मिट्टी की किस्म, जलवायु के हालातों आदि के आधार पर सिंचाई करें। सर्दियों में 15 दिनों के अंतराल पर और गर्मियों में 7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। तने को पानी के संपर्क में ना आने दें और खेत में पानी भी खड़ा ना होने दें।

पौधे की देखभाल
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तना गलन: 

तना गलन: पौधे के तने पर पानी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे पौधे के सभी तरफ फैल जाते हैं। पौधे के पत्ते पुरी तरह विकसित होने से पहले ही गिर जाते हैं।

उपचार : इस बीमारी की रोकथाम के लिए एम- 45, 300 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

जड़ गलन या सूखा 

जड़ गलन या सूखा इस बीमारी के कारण जड़ें गल जाती हैं जिसके कारण पौधा अपने आप ही सूख जाता है।

उपचार:
इस बीमारी की रोकथाम के लिए साफ 400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

पत्तों का धब्बा रोग:

सफेद धब्बे : पत्तों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के धब्बे विकसित हो जाते हैं। ये धब्बे प्रभावित पौधे के मुख्य तने पर भी पड़ जाते हैं। इसके कीट पौधे को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करते हैं। गंभीर हमले के कारण पत्ते गिर जाते हैं और फल समय से पहले ही पक जाते हैं।

उपचार : 
थायोफनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्लयु पी 300 ग्राम को 150-160 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

चितकबरा रोग पपीते का चितकबरा रोग

चितकबरा रोग पपीते का चितकबरा रोगपौधे के ऊपरी नए पत्तों पर इसके लक्षण देखे जा सकते हैं।

उपचार :
 इस बीमारी की रोकथाम के लिए, मैलाथियोन 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

चेपा: 

चेपा: ये कीट पौधे का रस चूसते हैं। चेपा पौधों में बीमारी को फैलने में मदद करता है।

उपचार : इस बीमारी की रोकथाम के लिए, मैलाथियोन 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फल की मक्खी :

फल की मक्खी : मादा मक्खी फल के मध्य में अंडे देती है, उसके बाद छोटे कीट फल के गुद्दे को अपने भोजन के रूप में लेते हैं जिससे फल नष्ट हो जाता है।

उपचार:इस कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियोन 300 मि.ली. को 150 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल की कटाई

मुख्यत: फल के पूरा आकार लेने और हरे से हल्का पीला रंग होने पर तुड़ाई की जाती है। पहली तुड़ाई रोपाई के 14-15 महीनों के बाद की जा सकती है। 4-5 तुड़ाइयां प्रति मौसम की जा सकती हैं।

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