प्याज (खरीफ)

सामान्य जानकारीATION

प्याज़ एक प्रसिद्ध व्यापक सब्जी वाली प्रजाति है| इसको रसोई के कार्यो में प्रयोग किया जाता है| इसके इलावा इस के कड़वे रस के कारण इसे कीटों की रोकथाम, कांच और पीतल के बर्तनों को साफ करने के लिए और प्याज़ के घोल को कीट-रोधक के तौर पर पौधों पर स्प्रे करने के लिए भी प्रयोग किया जाता है| ताजा खाने के साथ साथ इसका प्रयोग फ्लेक्स, पाउडर और पेस्ट के रूप में किया जाता है। बड़े प्याज की तुलना में छोटे प्याज में पोषक तत्व ज्यादा होते हैं। भारत प्याज़ की खेती के क्षेत्र में पहले और उत्पादन के तौर पर चीन के बाद दूसरे स्थान पर है| क्षेत्र और उत्पादकता के आधार पर कर्नाटक, मध्य प्रदेश और आंध्रा प्रदेष के बाद महाराष्ट्र मुख्य प्याज उत्पादक है।    

जलवायु

सामान्य तापमान

21-26°C

वर्षा

60-80CM

बुवाई के समय तापमान

18-20°C

कटाई के समय तापमान

25-30°C

मिट्टी

इसकी खेती अलग-अलग किस्म की मिट्टी जैसे की रेतली दोमट, चिकनी, गार और भारी मिट्टी में की जा सकती है| यह गहरी दोमट और जलोढ़ मिट्टी, जिसका निकास प्रबंध बढ़िया, नमी को बरकरार रखने की समर्थता, जैविक तत्वों वाली मिट्टी में बढ़िया परिणाम देती है| विरली और रेतली मिट्टी इसकी खेती के लिए बढ़िया नहीं मानी जाती है, क्योंकि मिट्टी के घटिया जमाव के कारण इसमें गांठों का उत्पादन सही नहीं होता है| इसकी खेती के लिए मिट्टी का pH 6-7 होना चाहिए|

ज़मीन की तैयारी

खेत को 3-4 बार जोतकर नर्म करें और जैविक खनिजों को बढ़ाने के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्टडालें। खेत को समतल करके क्यारियों और खालियों में बांट दें।

Kalyanpur Red Round: यह उत्तर प्रदेश की प्रसद्धि किस्म है। इसकी गांठे भूरे रंग की और गोलाकार आकार की होती हैं। इसके पौधे 150-160 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। इसकी औसतन पैदावार 8-10 टन प्रति एकड़ होती है।
 
Bhima Shakti: Suitable for growing in Kharif and Rabi season. Ready to harvest in 130days after transplanting, gives average yield of 170qtl/acre. 
 
Arka Kalyan: इसकी गांठे गहरे गुलाबी रंग की होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 135 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 
Pusa White Round: इसकी गांठे सफेद, गोल और समतल होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa white flat: इसकी गांठे सफेद, चपटी और मध्यम से बड़े आकार की होती हैं। यह किस्म डीहाइड्रेशन के लिए उपयुक्त है।
 
Other states variety
 
Pusa Red: इसकी गांठे मध्यम आकार और तांबे के रंग की होती हैं। इसे ज्यादा समय तक रखा जा सकता है। रोपाई के बाद ये 125-140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Ratnar: इसकी गांठे गोलकार समतल और गहरे लाल रंग की होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 120-160 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Madhavi: इसकी गांठे मध्यम से बड़े आकार की और हल्के लाल रंग की होती है। यह किस्म रोपाई के बाद 130-135 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Pusa Ridhi: यह किस्म खरीफ के साथ साथ रबी के मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी गांठे सघन, समतल गोलाकार के साथ गहरे लाल रंग की होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Arka Niketan: इसकी गांठे गोलाकार और आकर्षित रंग की होती हैं। यह किस्म 145 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। 
 
Arka Bindu: इसकी गांठे छोटे आकार की और गहरे गुलाबी रंग की होती हैं। यह जल्दी पकने वाली किस्म है और निर्यात के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Banglore Rose: इसकी गांठे छोटे आकार की और एक समान होती हैं। इसकी औसतन पैदावार 60 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Bhima Raj: इसकी गांठे गहरी लाल और अंडाकार आकार की होती है। यह किस्म 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
 
Bhima Red: यह किस्म खरीफ में पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी गांठे आकर्षित लाल रंग की होती हैं। यह किस्म 115-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 190-210 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 
 
Bhima Super: इसकी गांठे 100-110 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। इसकी औसतन पैदावार 105-115 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।
बीज की मात्रा
एक एकड़ के लिए 2-3 किलो बीज का प्रयोग करें|
 
बीज का उपचार
उखेड़ा रोग और कांव-गियारी से बचाव के लिए थीरम 2 ग्राम+बैनोमाइल 50 डब्लयू पी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी से प्रति किलो बीजों का उपचार करें| रासायनिक उपचार के बाद बायो एजेंट ट्राईकोडर्मा विराइड 2 ग्राम के साथ प्रति किलो बीजों का उपचार करने की सिफारिश की जाती है| इस तरह करने से नए पौधे मिट्टी से पैदा होने वाली और अन्य बीमारीयों से बच जाते है|
बुआई का समय
खरीफ के मौसम में रोपाई के लिए मई से जून का महीना नर्सरी तैयार करने के लिए उपयुक्त होता है। बिजाई के 6-8 सप्ताह बाद नए पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। जुलाई -अगस्त के महीने में रोपण कर दें।  
 
फासला
रोपण के समय, पंक्तियों के बीच 15 सैं.मी. और पौधों के बीच 10 सैं.मी. का फासला रखें| 
 
गहराई
नर्सरी में बीज 1-2 सैं.मी. गहराई पर बोयें| 
 
रोपाई का तरीका
बिजाई के लिए पनीरी ढंग का प्रयोग किया जाता है।
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
 
UREASSPMURIATE OF POTASH
6510030
ORGANIC Fertilizer Requirement (kg/acre)
 
BIO DAPNPKMIX FERTILIZER
100100100

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)

NITROGENPHOSPHORUSPOTASH
301616
खेत की तैयारी के समय सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट 20 टन प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन 40 किलो (यूरिया 90 किलो), फासफोरस 20 किलो (एस एस पी 125 किलो) और पोटाश 20 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 35 किलो) प्रति एकड़ में डालें। फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा लहसुन की बिजाई के 2 दिन पहले डालें। बाकी बची नाइट्रोजन को बिजाई के एक महीना बाद डालें। 
 
WSF: फसल को खेत में लगाने के 10-15 दिन बाद 19:19:19 और सूक्ष्म तत्व 2.5-3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

शुरुआत में नए पौधे धीरे-धीरे बढ़ते है| इसलिए नुकसान से बचाव के लिए गोड़ाई की जगह रासायनिक खरपतवार-नाशक का प्रयोग करें| रोकथाम के लिए बिजाई से 72 घंटे में पेंडीमैथालीन(स्टंप) 1 लीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें| खरपतवारो के अंकुरण उपरांत बिजाई से 7 दिन बाद आक्सीफ्लोरफैन 425 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें| नदीनों की रोकथाम के लिए 2-3 गोड़ाईयों की सिफारिश की जाती है| पहली गोड़ाई बिजाई से एक महीने बाद और दूसरी गोड़ाई, पहली से एक महीने बाद करें|

मिट्टी की किसम और जलवायु के आधार पर सिंचाई की मात्रा और आवर्ती का फैसला करें| आमतौर पर, इसे 5-8 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई बिजाई के तुरंत बाद करें और दूसरी सिंचाई रोपाई के तीन दिन बाद करें |बाकी की सिंचाई आवश्यकता और मिट्टी में नमी के आधार पर 7-10 दिनों के अंतराल पर करें। पुटाई के 10-15 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें। अत्याधिक सिंचाई ना करें। 

पौधे की देखभाल
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थ्रिप्स :

थ्रिप्स : यदि इस कीड़े को ना रोका जाये तो लगभग 50 प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है और यह शुष्क वातावरण में आमतौर पर आता है। यह पत्ते का रस चूसकर उसे ठूठी के आकार का बना देता है।
 
इसे रोकने के लिए नीले चिपकने वाले कार्ड 6-8 प्रति एकड़ लगाएं। यदि खेत में इसका नुकसान ज्यादा हो तो फिप्रोनिल 30 मि.ली. को प्रति 15 लीटर पानी या प्रोफेनोफॉस 10 मि.ली. या कार्बोसल्फान 10 मि.ली. + मैनकोजेब 25 ग्राम को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर 8-10 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें

सफेद सुंडी:

सफेद सुंडी: इस सुंडी का हमला जनवरी-फरवरी के महीने में होता है और यह जड़ों को खाती है और पत्तों को सुखा देती है।
 
इसे रोकने के लिए कार्बरील 4 किलाग्राम या फोरेट 4 किलोग्राम मिट्टी में डालकर हल्की सिंचाई करें या क्लोरपाइरीफॉस 1 लीटर को प्रति एकड़ में पानी और रेत में मिलाकर डालें।

जामुनी धब्बे और तने का फाइलियम झुलस रोग :

जामुनी धब्बे और तने का फाइलियम झुलस रोग : ज्यादा हमले की सूरत में उपज का लगभग 70 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है। पत्तों के ऊपर गहरे जामुनी धब्बे दिखाई देते हैं। पीली धारियां भूरे रंग की होकर पत्तों के शिखरों तक पहुंच जाती हैं।
 
इसे रोकने के लिए प्रोपीनेब 70 प्रतिशत डब्लयु पी 350 ग्राम को प्रति 150 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 10 दिनों के फासले पर दो बार करें।

फसल की कटाई

सही समय पर पुटाई करना बहुत जरूरी है| खुदाई का समय किस्म,ऋतु,मंडी रेट आदि पर निर्भर करता है| 50% पौधे की पत्तियां नीचे की तरफ गिरना दर्शाता है कि फसल खुदाई के लिए तैयार है| फसल की खुदाई हाथों से प्याज़ को उखाड़ कर की जाती है| खुदाई के बाद इनको 2-3 दिन के लिए अनावश्यक नमी निकालने के लिए खेत में छोड़ दे|

कटाई के बाद

खुदाई और पूरी तरह से सूखने के बाद, गांठों को आकार अनुसार छांट ले|

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