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भिंडी
भिंडी
- खरीफ/जून-जुलाई
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सामान्य जानकारीATION
यह विशेष तौर पर उष्ण और उपउष्ण क्षेत्रों में उगाई जाती है। भारत में भिंडी उगाने वाले मुख्य प्रांत उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा हैं। भिंडी की खेती विशेष तौर पर इसे लगने वाले हरे फल के कारण की जाती है। इसके सूखे फल और छिल्के को कागज़ उदयोग में और रेशा (फाइबर) निकालने के लिए प्रयोग किया जाता है। भिंडी विटामिन, प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य खनिजों का मुख्य स्त्रोत है।
जलवायु
सामान्य तापमान
20-30°C
वर्षा
80-120CM
बुवाई के समय तापमान
20-30°C
कटाई के समय तापमान
25-35°C
मिट्टी
भिंडी काफी तरह की मिट्टी में उगाई जा सकती है। भिंडी की फसल के लिए रेतली से चिकनी मिट्टी उचित होती है, जिसमें जैविक तत्व भरपूर मात्रा में हों और जिसकी निकास प्रणाली भी अच्छी ढंग की हो। यदि निकास अच्छे ढंग का हो तो यह भारी ज़मीनों में भी अच्छी उगती है। मिट्टी का पी एच 6.0 से 6.5 होना चाहिए। खारी, नमक वाली या घटिया निकास वाली मिट्टी में इसकी खेती ना करें।
ज़मीन की तैयारी
मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की जोताई करें। जोताई के बाद मिट्टी को समतल करने के लिए सुहागा फेरें। आखिरी जोताई के समय गाय का गला हुआ गोबर 40 क्विंटल प्रति एकड़ में डालें।
| Fungicide Name | Quantity (Dosage per Kg seed) |
| Carbendazim | 2gm |
| Imidacloprid | 5gm |
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| UREA | SSP | MURIATE OF POTASH |
| 90 | 100 | 35 |
आर्गेनिक खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| BIO DAP | NPK | MIX FERTILIZER |
| 150 | 100 | 100 |
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
| NITROGEN | PHOSPHORUS | POTASH |
| 40 | 16 | 20 |
खरपतवारो के विकास को रोकने के लिए गोडाई करनी चाहिए। बारिश के मौसम में मेंड़ों पर मिट्टी ज़रूर चढ़ानी चाहिए। पहली गोडाई 20-25 दिन बाद और दूसरी गोडाई बिजाई के 40-45 दिन बाद करें। खरपतवारो के अंकुरन से पहले नदीन नाशक डालने से खरपतवारो को आसानी से रोका जा सकता है। इसके लिए फलूक्लोरालिन (48 प्रतिशत) 1 लीटर या पैंडीमैथालीन 1 लीटर या एलाक्लोर 1.6 लीटर प्रति एकड़ डालें।
यदि मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी मौजूद ना हो तो गर्मियों में फसल के अच्छे अंकुरण के लिए बिजाई से पहले सिंचाई जरूर करनी चाहिए। बीज अंकुरण के बाद अगली सिंचाई करें। उसके बाद गर्मियों में 4-5 दिन के बाद खेतों को सिंचित करें और बारिश के मौसम में 10 से 12 बाद खेतों को सिंचित करें।
पौधे की देखभाल  
शाख और फल छेदक :
शाख और फल छेदक : यह कीट पौधे के विकास के समय शाख में पैदा होता है। इसके हमले से प्रभावित शाखा सूखकर झड़ जाती है। बाद में यह फलों में जा कर इन्हें अपने मल से भर देता है।
प्रभावित भागों को नष्ट कर दें। यदि इनकी संख्या ज्यादा हो तो स्पाइनोसैड 1 मि.ली. प्रति क्लोरॅट्रीनिलीप्रोल 18.5 प्रतिशत एस सी 7 मि.ली. प्रति 15 लीटर पानी या फलूबैंडीअमाइड 50 मि.ली. प्रति एकड़ को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
ब्लिस्टर बीटल:
चेपा:
जैसे ही हमला देखा जाये, तुरंत प्रभावित हिस्से नष्ट कर दें। डाइमैथोएट 300 मि.ली. प्रति 150 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई से 20-35 दिन बाद डालें। यदि जरूरत हो तो दोबारा डालें। हमला दिखने पर थाइमैथोक्सम 25 डब्लयु जी 5 ग्राम को प्रति 15 लीटर पानी की स्प्रे करें।
सफेद धब्बे :
सफेद धब्बे : इससे पत्तों की ऊपरी सतह पर सफेद रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जिसके कारण पत्ते सूख जाते हैं।
पत्तों के धब्बों का रोग :
पत्तों के धब्बों का रोग : इससे नए पत्तों और फलों पर सफेद धब्बे पड़ जाते हैं। गंभीर हमले की स्थिति में फल पकने से पहले ही झड़ जाते हैं। इससे फल की क्वालिटी भी कम हो जाती है और फल आकार में छोटे रह जाते हैं।
यदि इसका हमला दिखे तो घुलनशील सलफर 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी या डाइनोकैप 5 मि.ली. प्रति 10 लीटर पानी की स्प्रे 4 बार 10 दिनों के फासले पर करें। या ट्राइडमॉर्फ 5 मि.ली. या पैनकोनाज़ोल 10 मि.ली. प्रति 10 लीटर की स्प्रे 4 बार 10 दिनों के फासले पर करें।
चितकबरा रोग:
चितकबरा रोग: पौधों का विकास रुक जाना, पत्ते मुरझाना और फल के निचले हिस्से का पीला दिखाई देना इस बीमारी के मुख्य लक्षण हैं| रोकथाम: इसकी रोकथाम के लिए डियाज़ीनॉन डाली जाती हैं| इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8% ऐस एल 7 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिला कर प्रयोग करें|
जड़ गलन :
जड़ गलन :प्रभावित जड़ें गहरे भूरे रंग की हो जाती हैं और ज्यादा हमले की स्थिति में पौधा मर जाता है।
इसकी रोकथाम के लिए एक ही फसल खेत में बार बार ना लगाएं, बल्कि फसली चक्र अपनाएं। बिजाई से पहले बीजों को कार्बेनडाज़िम 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचार करें। मिट्टी में कार्बेनडाज़िम घोल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी डालें।
मुरझाना :
मुरझाना : इससे शुरूआत में पुराने पत्ते पीले पड़ जाते हैं और बाद में सारी फसल ही सूख जाती है। यह बीमारी फसल पर किसी भी समय हमला कर सकती है।
यदि इसका हमला दिखे तो पौधे की नज़दीक की जड़ों में कार्बेनडाज़िम 10 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी डालें।
फसल की कटाई
Depending upon variety, fruits are ready to harvest after 60 to 70 days of sowing. Small and tender fruit should be harvested. The fruits should be harvested in the morning and evenings. Delay in harvesting may make the fruits fibrous and they lose their tenderness and taste.
बीज उत्पादन
फसल बुआई के 60-70 दिनों के बाद पककर तैयार हो जाती है। छोटे और कच्चे फलों की तुड़ाई करें। फलों की तुड़ाई सुबह और शाम के समय करनी चाहिए। तुड़ाई में देरीसे भिंडियों में रेशा भर जाता है और इनका कच्चापन और स्वाद भी चला जाता है।