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राजमा
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सामान्य जानकारीATION
यह एक महत्तवपूर्ण दाल वाली फसल है और प्रोटीन का उच्च स्त्रोत है। यह फसल ऊष्ण और उप ऊष्ण क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह बारानी और अर्द्ध शुष्क शोतोष्ण क्षेत्रों की महत्तवपूर्ण फलीदार फसल है और इसे अकेले या अनाज वाली फसलों के साथ मिश्रित करके उगाया जा सकता है। यह नाइट्रोजन को बांध के रखती है। भारत में यह फसल आंध्र प्रदेश , गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में उगाई जाती है। उत्तर प्रदेश में लगभग 3.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 3.62 लाख टन अरहर का उत्पादन किया जाता है।
जलवायु
सामान्य तापमान
15-25°C
वर्षा
60 - 150CM
बुवाई के समय तापमान
22-25°C
कटाई के समय तापमान
28-30°C
मिट्टी
इसे मिट्टी की व्यापक किस्मों जैसे हल्की रेतली से भारी चिकनी मिट्टी में उगाया जा सकता है। जल निकास वाली दोमट ज़मीनों में इसकी पैदावार बहुत अच्छी होती है। यह नमक वाली मिट्टी के प्रति बहुत संवेदनशील है। लगभग 5.5-6 पी एच वाली ज़मीनों में इसकी पैदावार अधिक होती है।
ज़मीन की तैयारी
मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की 2-3 बार जोताई करें, खेत को समतल रखें ताकि उसमें पानी ना खड़ा रहे यह फसल जल जमाव के प्रति काफी संवेदनशील होती है। आखिरी जोताई के समय, 60-80 क्विंटल प्रति एकड़ रूड़ी की खाद डालें ताकि अच्छी पैदावार मिल सके।
VL Rajma 125: यह किस्म उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में समय से बोयी जाती है। इसकी फली में 4-5 बीज होते हैं और 100 बीज का भार लगभग 41.38 ग्राम होता है।
RBL 6: यह किस्म पंजाब में बोयी जाती है। इसके बीज हल्के हरे रंग के होते हैं और फली में 6-8 बीज होते हैं।
दूसरे राज्यों की किस्में
इसके इलावा भारत में उगाई जाने वाली प्रसिद्ध किस्में: HUR 15, HUR-137, Amber, Arun, Arka Komal, Arka Suvidha, Pusa Parvathi, Pusa Himalatha, VL Boni 1, Ooty 1आदि।
बीज की मात्रा
अगेती किस्मों के लिए 30-35 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ का प्रयोग करें। पॉल किस्मों की बिजाई पहाड़ी क्षेत्रों में 1 मीटर के फासले पर 3-4 पौधे प्रति पहाड़ी पर लगाए जाते हैं। बीज की मात्रा 10-12 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रयोग की जाती है।
बीज का उपचार
बिजाई से पहले थीरम 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। बीजों का छांव में सुखाएं और तुरंत बो दें।
बुआई का समय
बसंत की ऋतु में राजमांह की बिजाई फरवरी से मार्च और खरीफ की ऋतु में इसकी बिजाई मई से जून के महीने की जाती है। पंजाब में कुछ किसान राजमांह की बिजाई जनवरी के आखिरी सप्ताह करते हैं।
फासला
अगेती किस्मों के लिए कतारों में 45-60 सैं.मी. और पौधों में फासला 10-15 सैं.मी. रखें। पॉल जैसी किस्मों के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में पौधे का फासला 3-4 मीटर प्रति पहाड़ी होना चाहिए।
गहराई
बीज को 6-7 सैं.मी. गहरा बोयें।
रोपाई का तरीका
इसकी बिजाई गड्ढा खोदकर की जाती है। समतल क्षेत्रों में बीज पंक्तियों में बोयें जाते हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती बैड बनाकर की जाती है।
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
UREA | SSP | MURIATE OF POTASH |
18 | 150 | – |
ORGANIC Fertilizer Requirement (kg/acre)
BIO DAP | NPK | MIX FERTILIZER |
150 | 50 | AS PER SOIL |
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
NITROGEN | PHOSPHORUS | POTASH |
40 | 25 | – |
नाइट्रोजन 40 किलो (87 किलो यूरिया), फासफोरस 25 किलो (150 किलो एस एस पी) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। खाद डालने से पहले मिट्टी की जांच करवाएं।
फसल के शुरू में खरपतवारो की रोकथाम जरूरी है। इस अवस्था में खरपतवारो का हमला ना होने दें। खादें डालने और सिंचाई करने के साथ ही गोडाई कर दें। खरपतवारो के अंकुरन से पहले फ्लूक्लोरालिन 800 मि.ली. प्रति एकड़ या पैंडीमैथालीन 1 लीटर प्रति एकड़ का प्रयोग करें।th day after sowing and three irrigation at 25 days interval are necessary to get optimum yield. Give irrigation prior to blooming, during flowering and at pod development stage, water stress at these stage will lead to yield loss.
मिट्टी की किस्म, जलवायु और अन्य तत्वों के आधार पर हरी मूंग को तीन से चार सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। बिजाई के 30-35 दिनों के बाद पहली सिंचाई करें। उसके बाद, बाकी की सिंचाई आवश्यकता के आधार पर 15 दिनों के अंतराल पर करें।
पौधे की देखभाल  
थ्रिप्स :

थ्रिप्स :यह आम पाया जाने वाला कीट है। यह कीड़ा शुष्क मौसम में सबसे ज्यादा नुकसान करता है। यह पत्तों का रस चूसता है। जिस कारण पत्ते के किनारे मुड़ जाते हैं। फूल भी गिर पड़ते हैं। थ्रिप्स की जनसंख्या को जानने के लिए नीले रंग के 6-8 कार्ड प्रति एकड़ प्रयोग करें। इसके इलावा वर्टीसिलियम लेकानी 5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
ज्यादा नुकसान के समय इमीडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल या फिप्रोनिल 1 मि.ली. या एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी 1 ग्राम को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
2) If incidence of thrips is more, then take spray of Imidacloprid 17.8SL or Fipronil @1ml/Ltr water or Acephate 75% WP@1gm/Ltr.
चेपा:

चेपा: यह कीट पत्ते का रस चूसता है। जिस कारण पत्तों पर फफूंद लग जाती है और काले हो जाते हैं। यह फलियों को भी खराब कर देता है। इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 डब्लयु पी 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या मिथाइल डेमेटन 25 ई.सी. 2 मि.ली. प्रति पानी में प्रयोग करें। कीटनाशक जैसे कि कार्बोफ्यूरॉन, फोरेट 4-8 किलो प्रति एकड़ मिट्टी में डालकर फसल बीजने से 15 और 60 दिनों के बाद छिड़कने चाहिए।
To control take spray of Acephate 75SP@1gm/Ltr or Methyl demeton 25EC@2ml/Ltr of water. Soil application of granular insecticides viz Carbofuran, Phorate@4-8kg/acre on 15 and 60 days after transplanting were also effective.
जूं :

जूं :यह कीड़ा पूरे संसार में पाया जाता है। इसके नवजात शिशु पत्तों के नीचे की तरफ अपना भोजन बनाते हैं। प्रभावित पत्ते कप के आकार की तरह बन जाते हैं। ज्यादा नुकसान होने पर पत्ते गिर जाते हैं और टहनियां सूख जाती हैं।
यदि यह बीमारी ज्यादा बढ़ जाये तो क्लोरफेनापायर 15 मि.ली., एबामैक्टिन 15 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। यह एक खतरनाक कीड़ा है, जो कि 80 प्रतिशत तक फसल की पैदावार का नुकसान करता है। इसकी रोकथाम के लिए स्पाइरोमैसीफैन 22.9 एस सी 200 मि.ली. को 180 लीटर पानी में डाल कर प्रति एकड़ पर स्प्रे करें।
पत्तों का धब्बा रोग:

पत्तों का धब्बा रोग: इस बीमारी के कारण पत्तों के नीचे की तरफ सफेद रंग के धब्बे बन जाते हैं। इसके कीट पत्तों को अपना भोजन बनाते हैं। यह फसल के किसी भी विकास के समय हमला कर सकते हैं। कईं बार यह पत्तों की गिरावट का कारण भी बनते हैं।
पानी को खड़ा होने से परहेज़ करें और खेत साफ रखें। इसकी रोकथाम के लिए हैक्साकोनाज़ोल के साथ स्टिकर 1 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। अचानक बारिश होने पर इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। हमला होने पर घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।
सूखा:

मुरझाना : नमी और कम निकास वाली ज़मीनों में यह बीमारी ज्यादा आती है। यह बीमारी मिट्टी से पैदा होती है। ज्यादा पानी सोखने के कारण यह बीमारी नए पौधों के अंकुरन से पहले ही उन्हें मार देती है।
इसकी रोकथाम के लिए खालियों में कॉपर ऑक्सीकलोराइड 25 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 20 ग्राम को प्रति 10 लीटर पानी में डालकर इसकी स्प्रे करें।
पौधों की जड़ों को गलने से रोकने के लिए टराईकोडरमा बायो फंगस 2.5 किलोग्राम को प्रति 500 लीटर पानी में डालकर पौधे की जड़ों में डालें।
पीला चितकबरा रोग:

चितकबरा रोग: इस बीमारी के दौरान पत्तों पर हल्के और हरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। पौधे के अगले विकास में रूकावट पड़ जाती है। पत्तों और फलों पर पीले रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं। बिजाई के लिए सेहतमंद और बीमारी रहित बीजों का प्रयोग करें। प्रभावित पौधों को खेत में से उखाड़ कर नष्ट कर दें।
इसकी रोकथाम के लिए एसीफेट 75 एस पी 600 ग्राम को 200 लीटर पानी या मिथाइल डेमेटन 25 ई सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में डालकर स्प्रे करें।
फसल की कटाई
सब्जियों के लिए उगाई गई फसल पत्तों और फलीयों के हरे होने पर काटी जाती है और दानों वाली फसल को 75-80% फलीयों के सूखने पर काटा जाता है। कटाई में देरी होने पर बीज खराब हो जाते हैं। कटाई हाथों और मशीनों द्वारा की जा सकती है। कटाई के बाद पौधों को सूखने के लिए सीधे रखें । गोहाई कर के दाने अलग किए जाते हैं और आम तौर पर डंडे से कूट कर गोहाई की जाती है।
कटाई के बाद
कटाई की हुई फसल पूरी तरह से सुखी हुई होनी चाहिए और फसल को संभाल कर रखने के समय प्लस बीटल से बचाएं।